The Dussehra….

Celebrating a festival away from homeland can be the most nostalgic experience. And as a parent it really takes efforts to let our child experience similar kinds of joys. Joys that made our childhood.

The activity post is little late, but, better late than never.

With Halloween ghosts hanging around every where, I came up with only one idea for this Dussehra. Why not make our own Rawana! It would be least polluting and quite safe for a 4 year old to enjoy in the comfort of her own house. To share the wow s we also had a friend with us.

Raw materials : Sketch pens, Glue, Plain sheet of paper, Few match sticks, water and a plate

Age: Fun for 4+  as long as he is away from fire.

Important: Parent monitoring recquired. The drawing can be done by the child but the match work and fire has to be handled by the parent.

We first made our Rawana with ten heads. Then we glued the match stick on Rawana s head. We can follow with matchstick heads on each head. That would mean 10 matchstick heads, and lease one for burning. Or we can use three matchstick heads on Ravan’s heads and leave one for burning.

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We made Sita Mata in a Yellow Saree. Lord Rama and brother Lakshmana with bows behind their shoulders and Arrows in their hands.

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The pictures were for a quick kid activity so the drawing is not very good. But we had fun.

We did try the activity in the middle of a water filled plate. Rawana stood on a clay in the center. Sita ji sat close to the rim of the plate and Lord Rama stood on a floating plate. We stuck his pic on a toy plate with a clay . I used water to avoid any mis hap. As Rawana’s pic burned, the char fell into the water.

I later recreated everything for this post so you don’t see water here.

Stage was set. At this point I had to keep my kid to seated for the show; away from the water and fire. In case if u cannot help it don’t do this. The kid will lift the plate and if u have a burning matchstick at hand then, it would be too many things to handle. If you can anticipate such an event DONT TRY THIS.

The show:

We made Lord Rama take a few circles around Rawana and then he held his bow and arrow. I lit a matchstick and held it close to Lord Rama’s hand. I made my own dialogues, you can use shlokas if you know.

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Then he put the fire on the bad  Rawana. The fire grew big with every new matchstick and let me tell you it was fun to see my little daughter do waaaa.

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Happy Dussehra. Happy festivities…..

P.S.    The presentation was for a joyful kid activity. No religious ties involved.

Though I wanted to come up with drawings with every post, it’s quite difficult. So I thought I should put up things as they come and leave changes for later. Otherwise the feeling will grow stale and the idea will eventually fade away.

Yesternight my daughter wanted me to tell her a ‘good story’ coz she didn’t want the bad monsters to come in her dreams. And this is a simple one I came up with…

“Once upon a night, the frail and the very old granny was flying through the sky. She could still manage with her soft old wings, you know. Holding the tattered bag, filled with dreams. She coughed as she turned and mumbled as she bumped against the walls and window panes. Oh! She always forgets her spectacles at home. But she never ever forgets the homes of her lovely little children, waiting for her wonderful dreams.

But this pretty girl never wanted to sleep again fearing the giant monster might come in her dream.

So she jumped.

” Wake up sun, wake up sun, wake up sun… Mummy why is the sun not getting up?” She yelled.

She painted and sang. Heard some fairy stories. Held her eyelids out.

But like the gentle stream flows into a starlit night, she drifted into a deep deep deep deep sleep.

Granny, the patient audience, peeped in through the glass window and digged her hands into her bag.

Mushy mushy, Fairy, glittery …. Nope.

Something bright and beautiful ? Nope.

Something slimy…. Green smelly. Yucky?  Yes! Granny smiled.

She stretched and squeezed, coughed and squeezed. And a little monster popped out of her tiny nose. She tossed him in the slimy, smelly yucky thing.

From the dark dungeons of dreams, the little girl could see the monster coming. She was scared, very….. Very

….very scared. So Granny kissed her fingers and blew in the blessings of her love and courage. The little girl smiled! The monster trembled. Ho,ho! This monster was scared of smiles. So she smiled and laughed and scared away the monster. Phew!💐😤 See, smiling helps. So, keep smiling….

खीज

मेरा पांचवां पोस्ट – मेरी मम्मी ( सासु जी) ने एक बार मुझसे कहा था ” बहु और बेटी में बहुत अंतर होता है” उनका विचार निरपेक्ष है, क्योंकि उनकी बेटियां नहीं हैं लेकिन बेटियों का सुख उन्हें उनकी बहुओं ने ही दिया है। बेटी से बहु तक के हिंदी और अंग्रेजी के सफर को वो मुझसे बेहतर समझती हैं। आपका सच चाहे कुछ भी हो, मेरे लिए तो उनका सच सत्यवचन है। स्त्री और पुरुष के बीच के अंतर के समान बहु और बेटी के बीच के अंतर को कोई कभी नहीं मिटा सकता। ये आत्मा का भेद नहीं समय का भेद है। कई बहुएं समय के इस भेद को पार कर के सास के समीप एक सखी की भांति खड़ी हो जाती हैं। लेकिन उस स्वाभाविक मिलन के पहले कई हंसी, मज़ाक, क्लेश, द्वेष और मातृत्व प्रेम की कहानियां बनती हैं , उनमे से है आज की ये कहानी। मैं काल्पनिक कहूँ तो आप मानेंगे नहीं, क्योंकि ऐसा सबके साथ होता है। इसलिये केवल ये समझिये की पूरी और खीज की असफलता मेरी है और पात्र सारे काल्पनिक। मेरी ये कहानी, मेरी सासु माँ के लिए और मेरे स्वयं के लिए। ईश्वर हम सबको ऐसी सास दे जो अपनी बहू के गुणों का गुणगान अपनी सखियों से करे।

खीज…..

बहु ने कढाई में लाल मिर्च और जीरे का बघार लगाया और चावल के आटे का घोल डाल के खीज के पकने का इंतज़ार करने लगी। पूरी काण्ड के बाद उसने अपने सासरे के सारे पकवान सीखने की ठान ली थी। लेकिन उसे क्या पता था, खीज कोई इंस्टेंट मैग्गी नूडल थोडी थी, वो तो एक बहु की धैर्य क्षमता का मापदंड थी। मइके से लाये उसके संस्कारों का सिटीफिकेट थी। सास ससुर के आने में अभी समय था लेकिन नाश्ते के बाद सब चाय तो लेंगे ही, इसलिए बहु ने दूसरे स्टोव पे चाय भी उबलने के लिए रख दी। कुछ ही देर में सास ससुर भी आ गए। सासु माँ ने स्टोव देखके खीज के कहा ” भई आज तो नाश्ते में टाइम  लगेगा” बहु को कुछ समझ नहीं आया,” मम्मी खीज तो बस तैयार है, मैं प्लेट में लगा देती हूँ” बहु ने कहा।

“बहु, खीज के चेहरे को देख के लगता है, की अभी अगले एक घंटे में भी इसका रंग नहीं आनेवाला। “बहु को कुछ समझ नहीं आया। आये भी कैसे, खीज कोई उसके मइके में बनती थी क्या? लेकिन फिर भी उसने कोशिश तो की, मगर उससे क्या फर्क पड़ता है। नई बहू, वो भी दुसरे समाज की, उसपर जॉब वाली, गृहस्थ संस्कार की कचहरी में कठघरे पर खड़े करने के लिए केवल ये तीन गण ही काफी थे। खैर, सास ससुर ने ब्रेड बटर लगा के खा तो लिया लेकिन अनसुनी बातों में कई बातें हो गयीं। आखिरकार खीज एक घंटे में तैयार हुई और ठीक दो दिन बाद कानपुर से काकी सास ने उसकी खीज की असफलता का सर्टिफिकेट फ़ोन पे दे दिया “क्यों री बहुरिया, तुम्हारे घर में खीज नहीं बनता था क्या” घर ही घर के बीच इस अदृश्य संचार निगम से वो अबतक परिचित हो चुकी थी। उसे आज भी याद है जब पहली बार सास ससुर उसके घर आये थे और उसे पूरी का आटा लगाना था। ……माँ तो हमेशा सबके लिए एक सा आटा लगाती थीं। अब रोटी और पूरी के आटे में भी कोई फर्क होता है भला। आटे की लुगदी के संस्मरण को दिमाग में चिपकाये उसने अपनी सासु माँ से पूछा था “मम्मी, ये पूरी का आटा कैसे गूंथते हैं? रोटी जैसा ही होता है न?

अरे ये क्या पूछ लिया पगली, उसके मन से आवाज़ आयी थी। सासु माँ ने कुछ नहीं कहा, वो कहती भी क्या ?आखिर वो भी तो नई नई सास बनी थीं, लेकिन उनके हैरान चेहरे को देख के बहु इतना ज़रूर समझ गयी थी की उसने अपने पैरों पे कुल्हाड़ी नहीं बल्कि पिछली दिवाली की बची हुई लड़ी जला के छोड़ दी थी। और ये लड़ी रह रह के फूटने लगी। एक दिन अचानक कानपूर से काकी सास का फ़ोन आया था। वैसे तो वो जले पे नमक छिड़कने, लोगों के बीच आग लगाने और दरार पड़े रिश्तों में हथोड़े मारने जैसा काम मे महिर थीं, लेकिन जीवन रुपी इस चित्रपट के नाटकीय अंको में तालियां बजाना और चुटकियां लेना वो अपना जन्म सिद्ध अधिकार समझती थीं। और जब से उनके यहाँ एसटीडी फ्री हुआ था तबसे उनका आधिकारिक क्षेत्र कानपूर से फैल के मुम्बई तक पहुँच गया था।

ट्रिंग ट्रिंग ” …. कैसी हो बहुरिया, हम तो आज पूरी बना रहे थे न, तो तुम्हारी याद आगई, हमें भी कहाँ आता था पूरी का आटा गूंथना …”

बहु के कान सुन्न! यहाँ तो नेटवर्क एयरटेल से भी तगड़ा निकला। उस दिन तो बहु को लगा की रोड पे बैठा सब्जीवाला, उसके ऑफिस के दोस्त, शायद अमरीका में ओबामा जी को भी पता चल गया हो की उसे पूरी का आटा गूंथना नहीं आता। मम्मी ने मुझसे खुद क्यों नहीं कहा, उसने सोचा लेकिन रिश्तों की अस्पष्टता उसके लिए अब सपष्ट हो चुकी थी।

खैर, इन्टरनेट सर्वज्ञानी है, उसने दो तीन महीने में अपने सासरे के सारे पकवान सीख लिए। और मौका मिलते ही रिश्तदारों के लिए दाल बाटी, पुलाओ, और रायते बनाके तारीफ़ भी बटोर लीं। अब तक तो उसने मठरी, रोटी और पराठों के आटे के साथ साथ पास्ता, नूडल, और पिज़्ज़ा के आटों में भी पीएचडी कर ली थी।

एक दिन उसने बासी रोटी के टुकड़े करके उनका पोहा बनाया, सासु माँ ने अचम्बे से उस पोहे को देखा। खाते खाते अचानक उनकी आँख भरी आई और बहू की तरफ प्यार से निहारते हुए उन्होंने एक बच्चे के भांति कहा” ऐसा पोहा तो हमारी अम्मा बनाती थीं।” ऐसा भी प्यार होता है सास का। सास ने आँखों ही आँखों से बहु की कई बलइयाँ ले लीं थीं। बहु में गुण तो हैं, उन्होंने सोचा, लेकिन कुछ कहा नहीं, ज़्यादा प्रेम व्यक्त करतीं तो बहु सर न चढ़ जाती!

वैसे खीज बनाने की विधि उसे कहीं नहीं मिली। शायद किसी और नाम से हो! उसने कई और नाम ढूंढे लेकिन खीज तो अपने नाम सी है, खिजा के ही छोड़ती है। अम्मा से, देवरानी से, सासु माँ से और ससुर जी के हाथ से भी बनती देखने के बाद भी आज उससे खीज न बन पायी थी। लेकिन पूछने की गलती वो अब कैसे कर सकती थी।

दरअसल खीज एक बडा ही सरल व्यंजन है, लेकिन इसके बनाने की विधि बहुत कठिन। इसके बनाने के कई तरीके होंगे लेकिन जिस प्रकार सिलबट्टे में पिसी हरीमिर्च धनिया की चटनी, मिक्सी में पिसी गयी चटनी की तुलना में कई अंक सर्वोपरि होती है। मानो सिलबट्टे और हाथ के स्पर्श ने चटनी में सौंधापन घोल दिया हो। उसी प्रकार स्वाद के माँपदण्ड में कई मिनटों तक घोटके बनाई और कूकर में बनाई गयी खीज में बहुत अंतर होता है। धीमी आंच में पकते आटे के घोल को आप जितना घोटेंगे, खीज में उतना स्वाद बढ़ेगा। खीज बनाने का ये एक आदर्श तरीका है।  कारण सरल है,घोंटते हुए चावल में एक कसैलापन आ जाता है, कुछ चीन और जापान के राइस केक की तरह। और पकाने वाले की ऊर्जा शक्ति से इस खीज में स्वाद कई गुना बढ़ता है। लेकिन कई बहुएं इसे कूकर में सीटी देके बनाती हैं और सास नन्द को अपने आलस्य का एक नया प्रमाण दे देती हैं। इसलिए उसने ये खीज फिर अपनी देवरानी के संरक्षण में बनायी…. और जैसे उसके कान में किसी ने गर्म तेल डाल दिया हो। पूरी काण्ड की तीसरी वर्षगाँठ के समारोह के लिए बधाई सी देते हुए उसकी देवरानी ने उससे पूछा ” भाभी आपको पूरी का आटा गूंथना नहीं आता क्या?”

धन्यवाद।

The Happy Family…

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Once upon a time, there was a happy family. They were all happy because they all smiled, and….

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played together.

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Until, one day.

That day, they waited for somebody to push their car.

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To find them behind the curtains

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But no one came.

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Except the sound of somebody crying.

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They found out who. But they did not know what to say, or what to ask.

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So they all cried along…for hours ..for months for years, till there were no more tears left and then …

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They pushed their own car and had their meals and …

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And smiled and kept smiling forever and ever coz, they were the happy family.