यूरिनरी सिस टम

With age and time so many changes happen in our body, as if it has a laboratory of its own. For women this change is very quick and definite, specially after pregnancy. For example Hairfall, it is so common that many accept it as a norm. Symptoms whisper ‘hello, may be you have thyroid, bp, arthritis…. ‘ But gets a voice only when it screams.

Here is a small story about a woman who postpones her nature’s call for house work and suffers. Its so common that I did not name the characters.

अपनी भीगी साड़ी को चुपचाप समेटके वो कमरे में आगई। आँगन में बच्चों की आवाज़ उसे परेशान कर रही थी। ह्रदय चक्र में एक सुई सी चुभी। पलकें कई दफे फड़फड़ाने के बाद आँसू संभलगए लेकिंग रुंधे गले के भंवर को निगलना बहुत मुश्किल लग रहा था।

“ऐसे कैसे” उसने सोचा।

बच्ची से नानी बनने के इस सफर मे कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला। घर की रखरखाओ में खुद की देख रेख करना कोई कैसे भूल सकता है।

एक एक करके कई पल उसे याद आने लगे।

अभी कुछ दिन पेहले उसकी नींद देर से खुली थी, और एक के बाद एक सबके नाशते बनाते बनाते उसे बाथरूम जाने की फुर्सत हे नहीं मिली। लेकिन ये तो हर दिन की कहानी थी। कभी मार्किट में बाथरूम नहीं मिलते, तो कभी रोटियों से फुर्सत नहीं मिलती। उसने एहसास ही नहीं किया कि उसकी लापरवाही से वो एक नयी बीमारी का घर बन रही थी।

और आज, आज तो दीवाली थी। अब दिवाली के दिन कोई भला पडोसी को बम फोड़ने से रोक सकता है क्या? सब के साथ वो भी खड़ीं थी, फुलझड़ियां और अनार, चक्रियआं के टीम टी माते सुख में डूबी। उन्हें पता ही नहीं चला , कब पडोसी के बच्चे ने एक बेम फोड़ दिया। बम बहुत दूर था, बच्चे ने संभालके समझदारी से बम लगाया था। लेकिन ये सुख समाधी में कुछ यूँ लीन थीं की ईन्हें दायें बायें का कुछ पता न चला। ये यूँ हाकबकाईं की ईनकी साडी भीग गई। एक श राराती बच्चे ने अपनी हंसी रोकी और वो चुपचाप अपनी साड़ी स मेट के अ न्दर आ गई।

बुढ़ापा सबके जीवन के रिपोट कार्ड के सामान होता है। जवानी में क्या खाया, कितनी कसरत की, सब इस चलती फिरती ढांचेनुमा डिग्री में दिखता है। खुशी और दुःख चेहरे की झुर्रियों से झांकते हैं और सुकून की नींद आँखों पर लगे चश्मे से।

और इन्होंने तो अपने लिए एक नयी मार्कशीट तैयार कर ली थी। खैर, वो कपडे बदल के लेट गयीं। अब इस उम्र में कौन सी शर्म, सोचते सोचते दवाई के असर में वो सो गयीं।

………

‘डाक्टर! कोई ज़रूरत नहीं है। मै ठीक हूं,’ विज्ञानं की किताब से यूरिनरी सिस्टम रटवा दिया था बाबूजी ने, लेकिन वो टस से मस न हुयीं।

‘शर्म नहीं आती तुमको….. बच्चों के सामने ये क्या बकबकाये जा रहे हो’

लेकिन बाबूजी, बाबूजी तो बाबूजी थे ‘ वो अम्मा जी को लेके गए डॉक्टर के पास’ आखिर उनको भी उनकी गलती का एहसास था। जाने कितनी बार कभी उन्हें समय से खाना देने के लिये तो कभी सिर्फ उनके साथ के लिए अम्मा समय टाल दे ती थीं।

थो डा असर आयुर्वेदिक दवाई ने और बाकि घरवालों के प्यार ने दिखाया। लेकिन ये सब के नसीब में नहीं होता। इसलिए समय पर बाथरूम जाएं। एक रोटी बनाने के लिए आप अगर आज बाथरूम रोकेंगी तो आने वाले समय में बहुत सारी बीमारियां आएँगी। सबके साथ बाबूजी और घरवाले नहीं होते।

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