कविता का घर

“वो क्षितिज देखती हो? वहीं मेरा शून्य है, मैं वहीं से कवि ता लिखता हूं।

ये किचन का सिंक देखते हो? ये मेरा शून्य है। मैं यहीं से शुरू होती हूं और यहीं पे खत्म होती हूं।

इसीलिए तुम्हारी कविता नाली  में जाती है।

नहीं, समंदर में जाके मिलती है, तुम्हारी सोच जहां तक जाएगी तुम्हारी कविता भी वहीं तक जाएगी।

तुम्हें लगता है? कोई तुम्हें याद रखेगा?

मुझे कोई भूलेगा नहीं।

लेकिन तुम हो कहां?

तुम्हारी कविता में,

तुम्हारी ​क्षितिज में।”

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गुमशुदा चांद

‘ ये काली रात है,

या मैं स्याही में झांकता हूं।

तुम्हारी तरह आज मेरा चांद भी गुल है

मैं खुश हूं,

या तुम्हें पा लिया है

खिलखिलाहट के अलावा यहां हर चीज़ क्या शोरगुल है’