कविता का घर

“वो क्षितिज देखती हो? वहीं मेरा शून्य है, मैं वहीं से कवि ता लिखता हूं।

ये किचन का सिंक देखते हो? ये मेरा शून्य है। मैं यहीं से शुरू होती हूं और यहीं पे खत्म होती हूं।

इसीलिए तुम्हारी कविता नाली  में जाती है।

नहीं, समंदर में जाके मिलती है, तुम्हारी सोच जहां तक जाएगी तुम्हारी कविता भी वहीं तक जाएगी।

तुम्हें लगता है? कोई तुम्हें याद रखेगा?

मुझे कोई भूलेगा नहीं।

लेकिन तुम हो कहां?

तुम्हारी कविता में,

तुम्हारी ​क्षितिज में।”

मुस्कान

भंवरे को फूल से मिलते देखा है,

नदियों को सागर से मिलते देखा है,

चंदा को सूरज से मिलते देखा है

धरती को अंबर से मिलते देखा है

देखा है अनजानों को अपनों मिलते हुए

फिर भी जाने क्यों……

तुम्हारी मुस्कान तुम्हारी आंखों से नहीं मिलती….

प्रेम वेण

ये एक परिधि तेरी है

यह एक परिधि मेरी है

इस प्रेम शाख की छालो पर, हमने खींची लकीरें हैं

तू मौन खड़ा बस ताक मुझे, मैं भी दो वेण बनाती हूं

इस दो वेणी की अवधि तक, कुछ मैं भी रास रचाती हूं

कुछ सुरभी बह जाने दे, कुछ कोपल मुरझाने दे

आ देखें ,आ देखें, क्या रह पाएगा

मेरे मोगरे की वेणी या प्रेम तेरा

तू दौड़

तू दौङ,

तू दौड़ धडा धड़ दौड़।

इस दो फलाग़ की दुनिया के तू सारे लट्ठे तोड़।

तू दौड़,

तू दौड़ धडा धड़ दौड़।

जब तक छाती फट ती नहीं,

पथ की सीमा घटती नहीं,

इस् अन्त हीन आडम्बर की, बीमा पट्टी पटती नहीं,

तू दौड़।

तू दौड़ की तेरी नाडी में ओज का षटकोण ऐंठा है,

साँझ की चादर ओढे सूरज, तेरी सुबह की ताक मे बैठा है।

तू दौड़…… बस दौड़….

(Inspired from the energy build up in Delhi these days)