ये गर्भ क्यों नहीं ठहरता?

समय थम जाता है
सांसें रुक जाती हैं
ये पत्तों की सरसराहट भी मेरे आने पे छुप जाती है
तुम जहाँ ठहर जाते हो
वहीँ मैं भी ठहर जाती हूं
लेकिन सफर क्यों नहीं ठहरता
ये गर्भ क्यों नहीं ठहरता?
कोपलें खिल रही हैं
मौसम बदल रहा है
चिडिय़ा के घोंसलों मे चूज़े चूं चूं कर रहे हैं
अब तो मेरे आंगन के
आम की बोर भी मुझे चिडाती है
‘ तेरे घर के आंगन से
किलकारी कयों नहीं आती है? ‘
कितने मूंगे खप गये
बैंगन भी मुंह छिपाते हैं
बृहस्पति और शुक्र भी अब,
मेरी भेंट से लजाते हैं ‘
दबी दबी आवाजों मेंं
बडे बडे कह जाते हैं
‘ अंग अंग है भर रहा, फिर
पांव कयों हल्के रह जाते हैं? ‘
सिल बट्टे सारे पूज लिए
घर के अपशकुनि भी बूझ लिए
सारे त्योरी चडाते हैं
मुझे ही अपशकुनि बुलाते हैं
‘रेगिस्तान के सूखे मे भी
हरे श़ाख दिख जाते हैं,
पर तेरे पथ के बाडे में तो
सूखे फल ही आते हैं’
मैं लकीरें उकेर के मुस्काऊं
सोचूं,
मुझसे कुछ तो हो जाता है
इन रंगों के मतभेद में
सब ईंद्रधनुष हो जाता है
देखो,
दो रंग भी मिलके
इक नया रंग बनाते हैं
फिर मेरे रंगे चित्र ही
क्यों बेरंगे रह जाते हैं?
पर रात कितनी ही स्याह रहे
सूरज फिर भी उगता है
आखिर, सीपी के संकोच भेद
मे भी एक मुक्ता है
जब तक मेरी आस है
ये मेरा रति प्रयास रहे
मैं ना जानूं जीवन बंजर
मेरी कला उर्वर उजास रहे।
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मासिका अभिनंदन

धीमे से मासिक आऐ

पांव थके, कमर गठियाए

बूंद बूंद अलसाए
चुपके से मासिक आए
घोंघा बन बिस्तर में ऐठूं
स्नेह से मां सहलाए
इस एकाकी विलासिता में
कोई पास न आए

……..

मन भ्रमित, तन विचलित
क्या विज्ञान! ना बूझे गणित
इतिहास खडा खिसियाए
क्यों कर मासिक आए
लाली आभा, जान सखी मोरी
आढ बनाए कोरी
मैं मूरख, किसी द्रव्य तरल सी,
रोऊँ चोरी चोरी
मां बोली
हट पगली,
मैं तेरी, तू मेरी सहेली
वैसे ही सहती है
फिर क्यों नीर संग बहती है
सावन, हेमन्त, बसंत के बाद
जैसे पतझड़ आए
वैसे ही मासिक आए
……..
सत्रित्व की पहचान है ये
प्रकृति का वरदान है
नवजीवन को जनने का
ये अपना सा अभिमान है
ममता की धैर्य जटिलता का कुछ कुछ अनुमान कराऐ
बस ऐसे मासिक आए
…..
चल तेरा पंचांग बनाते हैं
कुछ केसरी चिन्ह लगाते हैं
तेरे क्षय के खाने का
समपूर्ण आहार बनाते हैं
………
इक बात हमेशा याद रहे
ये बटुआ तेरे पास रहे
तेरी श्रिंगार दानी में जैसे
कोई नवीन श्रिंगार आ जाए
वैसे ही मासिक आए
……….
ये क्षोभ का कोप नहीं
सत्री धैर्य की वाणी है
दीदी, चाची, दादी, नानी
सबकी यही कहानी
नानी से मां से
मां से मुझसे,
मुझसे तू जैसे आए
वैसे ही मासिक आए
अक्षत, कुम कुम
हल्दी चंदन
ये मेरा तुझको मासिक अभिनंदन।
..।।।।।।

कविता का घर

“वो क्षितिज देखती हो? वहीं मेरा शून्य है, मैं वहीं से कवि ता लिखता हूं।

ये किचन का सिंक देखते हो? ये मेरा शून्य है। मैं यहीं से शुरू होती हूं और यहीं पे खत्म होती हूं।

इसीलिए तुम्हारी कविता नाली  में जाती है।

नहीं, समंदर में जाके मिलती है, तुम्हारी सोच जहां तक जाएगी तुम्हारी कविता भी वहीं तक जाएगी।

तुम्हें लगता है? कोई तुम्हें याद रखेगा?

मुझे कोई भूलेगा नहीं।

लेकिन तुम हो कहां?

तुम्हारी कविता में,

तुम्हारी ​क्षितिज में।”

मुस्कान

भंवरे को फूल से मिलते देखा है,

नदियों को सागर से मिलते देखा है,

चंदा को सूरज से मिलते देखा है

धरती को अंबर से मिलते देखा है

देखा है अनजानों को अपनों मिलते हुए

फिर भी जाने क्यों……

तुम्हारी मुस्कान तुम्हारी आंखों से नहीं मिलती….

प्रेम वेण

ये एक परिधि तेरी है

यह एक परिधि मेरी है

इस प्रेम शाख की छालो पर, हमने खींची लकीरें हैं

तू मौन खड़ा बस ताक मुझे, मैं भी दो वेण बनाती हूं

इस दो वेणी की अवधि तक, कुछ मैं भी रास रचाती हूं

कुछ सुरभी बह जाने दे, कुछ कोपल मुरझाने दे

आ देखें ,आ देखें, क्या रह पाएगा

मेरे मोगरे की वेणी या प्रेम तेरा

तू दौड़

तू दौङ,

तू दौड़ धडा धड़ दौड़।

इस दो फलाग़ की दुनिया के तू सारे लट्ठे तोड़।

तू दौड़,

तू दौड़ धडा धड़ दौड़।

जब तक छाती फट ती नहीं,

पथ की सीमा घटती नहीं,

इस् अन्त हीन आडम्बर की, बीमा पट्टी पटती नहीं,

तू दौड़।

तू दौड़ की तेरी नाडी में ओज का षटकोण ऐंठा है,

साँझ की चादर ओढे सूरज, तेरी सुबह की ताक मे बैठा है।

तू दौड़…… बस दौड़….

(Inspired from the energy build up in Delhi these days)

यूरिनरी सिस टम

With age and time so many changes happen in our body, as if it has a laboratory of its own. For women this change is very quick and definite, specially after pregnancy. For example Hairfall, it is so common that many accept it as a norm. Symptoms whisper ‘hello, may be you have thyroid, bp, arthritis…. ‘ But gets a voice only when it screams.

Here is a small story about a woman who postpones her nature’s call for house work and suffers. Its so common that I did not name the characters.

अपनी भीगी साड़ी को चुपचाप समेटके वो कमरे में आगई। आँगन में बच्चों की आवाज़ उसे परेशान कर रही थी। ह्रदय चक्र में एक सुई सी चुभी। पलकें कई दफे फड़फड़ाने के बाद आँसू संभलगए लेकिंग रुंधे गले के भंवर को निगलना बहुत मुश्किल लग रहा था।

“ऐसे कैसे” उसने सोचा।

बच्ची से नानी बनने के इस सफर मे कितना समय निकल गया पता ही नहीं चला। घर की रखरखाओ में खुद की देख रेख करना कोई कैसे भूल सकता है।

एक एक करके कई पल उसे याद आने लगे।

अभी कुछ दिन पेहले उसकी नींद देर से खुली थी, और एक के बाद एक सबके नाशते बनाते बनाते उसे बाथरूम जाने की फुर्सत हे नहीं मिली। लेकिन ये तो हर दिन की कहानी थी। कभी मार्किट में बाथरूम नहीं मिलते, तो कभी रोटियों से फुर्सत नहीं मिलती। उसने एहसास ही नहीं किया कि उसकी लापरवाही से वो एक नयी बीमारी का घर बन रही थी।

और आज, आज तो दीवाली थी। अब दिवाली के दिन कोई भला पडोसी को बम फोड़ने से रोक सकता है क्या? सब के साथ वो भी खड़ीं थी, फुलझड़ियां और अनार, चक्रियआं के टीम टी माते सुख में डूबी। उन्हें पता ही नहीं चला , कब पडोसी के बच्चे ने एक बेम फोड़ दिया। बम बहुत दूर था, बच्चे ने संभालके समझदारी से बम लगाया था। लेकिन ये सुख समाधी में कुछ यूँ लीन थीं की ईन्हें दायें बायें का कुछ पता न चला। ये यूँ हाकबकाईं की ईनकी साडी भीग गई। एक श राराती बच्चे ने अपनी हंसी रोकी और वो चुपचाप अपनी साड़ी स मेट के अ न्दर आ गई।

बुढ़ापा सबके जीवन के रिपोट कार्ड के सामान होता है। जवानी में क्या खाया, कितनी कसरत की, सब इस चलती फिरती ढांचेनुमा डिग्री में दिखता है। खुशी और दुःख चेहरे की झुर्रियों से झांकते हैं और सुकून की नींद आँखों पर लगे चश्मे से।

और इन्होंने तो अपने लिए एक नयी मार्कशीट तैयार कर ली थी। खैर, वो कपडे बदल के लेट गयीं। अब इस उम्र में कौन सी शर्म, सोचते सोचते दवाई के असर में वो सो गयीं।

………

‘डाक्टर! कोई ज़रूरत नहीं है। मै ठीक हूं,’ विज्ञानं की किताब से यूरिनरी सिस्टम रटवा दिया था बाबूजी ने, लेकिन वो टस से मस न हुयीं।

‘शर्म नहीं आती तुमको….. बच्चों के सामने ये क्या बकबकाये जा रहे हो’

लेकिन बाबूजी, बाबूजी तो बाबूजी थे ‘ वो अम्मा जी को लेके गए डॉक्टर के पास’ आखिर उनको भी उनकी गलती का एहसास था। जाने कितनी बार कभी उन्हें समय से खाना देने के लिये तो कभी सिर्फ उनके साथ के लिए अम्मा समय टाल दे ती थीं।

थो डा असर आयुर्वेदिक दवाई ने और बाकि घरवालों के प्यार ने दिखाया। लेकिन ये सब के नसीब में नहीं होता। इसलिए समय पर बाथरूम जाएं। एक रोटी बनाने के लिए आप अगर आज बाथरूम रोकेंगी तो आने वाले समय में बहुत सारी बीमारियां आएँगी। सबके साथ बाबूजी और घरवाले नहीं होते।